Monday, January 28, 2008

एक नन्हा दिया... कवि -अनामिक

सामने कोहरा घना है, और मैं सूरज नही हूँ,
क्या मैं इसी एहसास मे जिउ ?

या जैसा भी हूँ एक नन्हा दिया तो हूँ,
क्यों न इसी कि उजास मे जिउ ?

हर आनेवाला क्षण मुझसे यही कहता है,
अरे भाई सूरज तो नही हो तुम,
और मैं कहता हूँ ,

"न सही सूरज एक नन्हा दिया तो हूँ ।
जितनी भी है लव मुझमे , उसे लेकर जिया तो हूँ।
कम से कम मैं उनमे तो नही
जो चांद दिलके बुझाये बैठे है
उड़ते रहते थे जो जुगनू आंगन मे
उन्हें भी मुट्ठियो मे दबाये बैठे है ! "

...मैंने ये कविता शिक्षा सोपान के संस्थापक श्री प्रणय जी से सुनी,
एक बहोत ही अच्छी और प्रेरणादायी कविता !

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